दीपक श्रीवास्तव
जीवन में विवेक, सत्संग और आध्यात्मिक ज्ञान का विशेष महत्व : पं. रजनीकांत द्विवेदी
श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन हनुमान महिमा, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव और पुतना प्रसंग का हुआ वर्णन
जौनपुर। नगर के विवाह मैरेज लॉन में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन कथाव्यास पं. रजनीकांत द्विवेदी ने हनुमान महिमा, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव और पुतना वध के प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि सत्संग का प्रभाव इतना गहरा होता है कि मनुष्य का पूरा जीवन बदल सकता है। सत्संग के सामने संसार के सुख और वैभव का कोई विशेष महत्व नहीं है। मनुष्य के जीवन की वास्तविक सार्थकता परमात्मा के भजन, संकीर्तन और उनकी कथा के श्रवण में है। हनुमान जी की महिमा का वर्णन करते हुए कथाव्यास ने बताया कि प्रभु श्रीराम की कथा के प्रति उनकी भक्ति और समर्पण अद्वितीय था। उन्होंने प्रसंग सुनाया कि जब प्रभु श्रीराम ने हनुमान जी से अपने साथ चलने के लिए कहा, तो हनुमान जी ने पूछा कि क्या वहां भी प्रभु की कथा सुनने को मिलेगी। जब उन्हें बताया गया कि कथा का श्रवण धरती पर ही संभव होगा, तो उन्होंने साकेत धाम जाने के बजाय यहीं रहने का निर्णय लिया। पं. द्विवेदी ने कहा कि हनुमान जी भगवान श्रीराम की कथा में इतने लीन रहते थे कि उनके लिए कथा श्रवण ही सबसे बड़ा सुख था। उन्होंने सच्चे सेवक के रूप में प्रभु की सेवा की और अपने आचरण से समर्पण, निष्ठा तथा भक्ति का आदर्श प्रस्तुत किया। मनुष्य को हनुमान जी के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति परमात्मा के भजन और संकीर्तन से दूर रहता है, वह अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण अवसर से वंचित रह जाता है।
श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का प्रसंग सुनाते हुए कथाव्यास ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से नंद बाबा और माता यशोदा के घर आनंद छा गया। नंद बाबा ने 108 ब्राह्मणों को आमंत्रित कर अपने घर में पाठ कराया। भगवान के जन्म की खुशी में उन्होंने खुले मन से दान-पुण्य किया। जो भी उनके घर पहुंचा, उसे वस्त्र और आभूषण भेंट किए गए। उन्होंने सवा लाख गायों का गोदान कराया। कथाव्यास ने कहा कि नंद बाबा का आनंद और उत्साह देखते ही बनता था। भगवान श्रीकृष्ण का पालन-पोषण करने का सौभाग्य माता यशोदा को मिला, जो उनके पुण्य प्रताप का फल था। उन्होंने ब्रजमंडल की महिमा बताते हुए कहा कि ब्रज की 84 कोस की परिक्रमा का धार्मिक महत्व है। श्रद्धा और विश्वास के साथ ब्रज की परिक्रमा करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। उन्होंने कथा के माध्यम से बताया कि कंस को जब यह सूचना मिली कि जिस बालक से उसे भय था, उसका जन्म हो चुका है, तो वह चिंतित हो उठा। कंस ने उस बालक को मारने के लिए अनेक प्रयास किए और इसी क्रम में पुतना को भेजा।
पुतना के प्रसंग का वर्णन करते हुए पं. रजनीकांत द्विवेदी ने बताया कि पुतना ने कंस को आश्वासन दिया था कि वह उसकी मनोकामना पूरी कर देगी। इसके लिए उसने अपना स्वरूप बदलने की बात कही। कथा के अनुसार, पुतना ब्रज पहुंची और अनेक शिशुओं को मारने के बाद महल में प्रवेश किया। उसने अपने स्तनों पर विष का लेप किया और भगवान श्रीकृष्ण को अपने पास लेकर उन्हें विषपान कराने का प्रयास किया।
इस प्रसंग की आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए कथाव्यास ने कहा कि पुतना का अर्थ अविद्या है। जहां अविद्या का वास होता है, वहां विवेक का अभाव मनुष्य को संकट में डाल सकता है। इसलिए जीवन में विवेक, सत्संग और आध्यात्मिक ज्ञान का विशेष महत्व है। मनुष्य को सही और गलत के बीच अंतर समझते हुए अपने जीवन में सदाचार और भक्ति को स्थान देना चाहिए। कथा के दौरान श्रद्धालु श्रीकृष्ण जन्मोत्सव और अन्य प्रसंगों को सुनकर भावविभोर हुए। सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा की मुख्य यजमान श्रीमती विमला सेठ हैं। इस अवसर पर मनोज पाण्डेय, राकेश कुमार सिंह, सोनी, सुनील मिश्र, आचार्य सूरत तिवारी, संतोष कुमार जी, नीलम, किरण सेठ, रेखा सेठ, बबली सेठ, अर्चना, विशाल सेठ, विपिन सेठ, हर्षित सेठ, हार्दिक सेठ समेत गठना कोठी परिवार के सदस्य और अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
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