दीपक श्रीवास्तव
गमगीन माहौल में मनाया गया यौमे आशूरा, नौहा-मातम के बीच ताजिए कर्बलाओं में सुपुर्द-ए-खाक
जौनपुर। जनपद में शुक्रवार को गमगीन माहौल और अकीदत के साथ यौमे आशूरा मनाया गया। अजादारों ने नौहा और मातम करते हुए इमाम हुसैन व कर्बला के शहीदों को खिराज-ए-अकीदत पेश किया। निर्धारित समय के अनुसार नगर के विभिन्न इलाकों से ताजिए उठाए गए और जुलूस अपने पारंपरिक मार्गों से होते हुए कर्बलाओं तक पहुंचे, जहां उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया।
नगर क्षेत्र के अधिकांश ताजिए सदर इमामबारगाह स्थित गंजे शहीदा में दफ्न किए गए, जबकि कुछ ताजिए मोहल्लों की स्थानीय कर्बलाओं में सुपुर्द-ए-खाक हुए। चहारसू चौराहे से निकला प्रमुख जुलूस शिया जामा मस्जिद से होकर विभिन्न मार्गों से गुजरते हुए सदर इमामबारगाह पहुंचा। इसके अलावा इमामबाड़ा शाह अबुल हसन भंडारी, मीर सैयद अली बलुआघाट, कटघरा, रिजवी खां, पुरानी बाजार, ताड़तला, बारादुअरिया, यहियापुर और पानदरीबा के ताजिए भी गंजे शहीदा में दफ्न किए गए। वहीं सिपाह मोहल्ले के ताजियों को नबी साहब स्थित गंजे शहीदा में सुपुर्द-ए-खाक किया गया।
इससे पहले बलुआघाट स्थित शाही किला मस्जिद, मोहल्ला दीवान शाह, कबीर, ताड़तला सहित विभिन्न मस्जिदों में नमाज-ए-आशूरा अदा की गई। शाही किले में सुबह आमाल की नमाज में भी बड़ी संख्या में लोगों ने शिरकत की।
देर शाम सदर इमामबारगाह के ईदगाह मैदान में मजलिस-ए-शाम-ए-गरीबां का आयोजन हुआ। मजलिस को संबोधित करते हुए मौलाना सैयद ज़ोहैरकैन अब्बास नकवी (सहारनपुर) ने कर्बला की घटना का जिक्र करते हुए बताया कि किस प्रकार हजरत इमाम हुसैन और उनके 71 साथियों को तीन दिन तक भूखा-प्यासा रखकर शहीद कर दिया गया। उन्होंने कहा कि इमाम की शहादत के बाद उनके परिवार की महिलाओं और बच्चों पर हुए अत्याचार आज भी इंसानियत को झकझोर देते हैं। इसी दर्द और गम को याद करते हुए लोग हर वर्ष यौमे आशूरा पर एकत्र होकर शहीद-ए-कर्बला को पुरसा पेश करते हैं।
मजलिस के बाद शबीहे तुर्बत बरामद हुआ। इस दौरान "या हुसैन, या हुसैन" की सदाओं से पूरा वातावरण गूंज उठा। कार्यक्रम का संचालन तहसीन शाहिद सभासद ने किया। यौमे आशूरा के अवसर पर हजारों की संख्या में अजादारों ने शिरकत कर इमाम हुसैन और शहीद-ए-कर्बला को श्रद्धापूर्वक याद किया।
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